जनपथ न्यूज़ पटना: आख़िर पवन वर्मा के इस बात में क्या तथ्य हैं कि नीतीश कुमार ने कहा है कि भाजपा उन्हें अपमानित कर रही है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस बात से नाराज़ हैं कि निजी बातचीत को उनकी पार्टी के नेता पवन वर्मा ने एक पत्र में सार्वजनिक रूप से लिखा. नीतीश ने पत्र का जवाब देने से इनकार करते हुए उन्हें दूसरी पार्टी में जाने की शुभकामना भी दी. लेकिन नीतीश कुमार ने अभी तक ये नहीं कहा है कि पवन वर्मा ने काल्पनिक बातें लिखी हैं. लेकिन सवाल है कि क्या भाजपा सही में नीतीश कुमार को नज़रंदाज़ कर रही है जिससे उन्हें अपमानित महसूस हो रहा है? और क्या ऐसे उदाहरण हैं? हालांकि सब इस बात पर सहमत हैं कि पवन वर्मा को निजी बातचीत के अंश कभी पत्र में लिख कर सार्वजनिक नहीं करने चाहिए थे लेकिन नीतीश समर्थकों का कहना है कि ढाई साल के दौरान ऐसे कई मौक़े आये जिससे लगा कि मोदी सरकार नीतीश कुमार की परवाह नहीं करती.
मामले से जुड़ी अहम जानकारियां :

  1. ताज़ा उदाहरण है बाढ़ राहत से संबंधित केंद्र सरकार की अनुदान राशि जिसमें अभी तक 2019 में आए अलग-अलग दो बार भीषण बाढ़ के लिए केंद्र सरकार द्वारा बिहार को मात्र 400 करोड़ रुपये दिए गए हैं जबकि कर्नाटक को दो किश्तों में तीन हज़ार करोड़ और कांग्रेस शासित मध्यप्रदेश को 1700 करोड़. यह पहली बार नहीं है जब केंद्र के सहयोगी दल होने के बावजूद नीतीश कुमार ने जितनी सहायता राशि मांगी थी कि उसका 25 प्रतिशत भी अनुदान में नहीं दिया गया. 2018 में आयी बाढ़ के बाद बिहार सरकार जितने मुआवजे की मांग की थी उससे काफी कम मुआवजा केंद्र सरकार ने दिया था. लगातार दो सालों में केंद्र सरकार द्वारा नीतीश कुमार को जिस प्रकार से नज़रअंदाज़ किया गया उससे वो क़तई ख़ुश नहीं. और अब बिहार के आपदा मंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री को पत्र लिखकर अपना विरोध और मांग को दोहराई है.
  2. यह एक संयोग कहिए कि एक ओर जहां केंद्र सरकार द्वारा बार राहत की मांग ठुकराई गई वहीं राज्य के जल संसाधन विभाग द्वारा कोसी मेची नदी की इंटर लिंकिंग की 4 करोड़ से अधिक की परियोजना को भी केंद्र सरकार के जल शक्ति विभाग ने ठंडे बस्ते में डाल दिया है. इसकी विधिवत सूचना राज्य सरकार को ये कहते हुए दी गयी है कि इसे राष्ट्रीय प्रोजेक्ट में शामिल करने के अनुरोध पर भविष्य में विचार किया जायेगा.
  3. इसी विभाग से जुड़ा एक मामला है गंगा की निर्मलता और अविरलता का. नीतीश कुमार जब से गंगा नदी के कारण बिहार के कई ज़िलों में बाढ़ आयी तब से ये मांग बार-बार कर रहे हैं कि जब तक नदी की निर्मलता और अविरलता पर ध्यान नहीं दिया जाएगा और गाद जैसी समस्या का समाधान नहीं ढूंढा जाएगा तब तक लोगों की परेशानी बरकरार रहेगी. लेकिन उनके बार-बार पत्र लिखने के बावजूद केंद्र सरकार ने उनकी मांगों को कभी गंभीरता से नहीं लिया. पिछले हफ़्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे 1 पत्र में भी उन्होंने इस बात का फिर से ज़िक्र किया. यह पत्र उन्‍होंने बिहार के नालंदा की निवासी जो पिछले कई दिनों से हरिद्वार में अनशन पर बैठी हैं, उनके संबंध में लिखा था.
  4. 2015 के चुनावों के पूर्व बिहार के लिए 24 पैकेज की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की थी और जिसे प्रधानमंत्री विशेष पैकेज का नाम दिया गया उसके संबंधित है. अभी भी कई ऐसे प्रोजेक्ट हैं जिनका कार्य का शुभारंभ भी नहीं हुआ है. इन प्रोजेक्ट के बारे में न तो नीतीश बात करते हैं और न ही BJP का कोई मंत्री और न ही कोई व्हाइट पेपर जारी करने के लिए तैयार है.
  5. नीतीश कुमार के समर्थक कहते हैं कि केंद्र सरकार उनकी बातों को मानती है लेकिन उसे उलझाकर सालों लगा देती है. इसका एक उदाहरण है 2014 के बजट में बिहार के लिए दूसरे एम्स की स्थापना की घोषणा. नीतीश कुमार ने इसके लिए पहले दिन से दरभंगा के नाम को प्रस्तावित किया लेकिन पांच वर्षों के बाद अब जाकर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसे मंज़ूर किया है क्योंकि केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे इसमें अड़ंगा लगाए हुए थे और इस अब साल के अंत तक इस पर काम शुरू हो पाएगा.
  6. केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी जनता दल यूनाइटेड के सांसदों का अभी तक प्रतिनिधित्व नहीं है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने नीतीश कुमार के आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग को ख़ारिज कर दिया था. लोकसभा चुनाव में 40 में से 39 सीटों पर जीत दिलाने के बावजूद नीतीश कुमार की मांगों को मानने से इनकार कर दिया गया. शायद ये ऐसा कटु अनुभव है जिसके कारण दूसरी बार जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शपथ ली है, बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार ने अभी तक उनसे औपचारिक रूप से मुलाक़ात नहीं की है. हालांकि वो प्रधानमंत्री द्वारा बुलायी गई बैठकों में जाते हैं.
  7. नीतीश कुमार आज तक नहीं भूले होंगे कि किस प्रकार से सरकार बनाने के बाद पटना विश्वविद्यालय के समारोह में उनके बार-बार आग्रह करने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पटना विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने से इनकार कर दिया था. लेकिन साथ ही साथ प्रधानमंत्री ने जो विशेष आर्थिक सहायता पटना विश्वविद्यालय को देने का वादा किया था उसे भी आज तक पूरा नहीं किया है. उस दिन के कटु अनुभवों के बाद नीतीश कुमार ने सार्वजनिक रूप से कोई मांग करना बंद ही कर दिया.
  8. लोकसभा चुनाव के दौरान जैसे NDA की बैठक बुलाई जाती थी, नरेंद्र मोदी का चाहे नामांकन हो या नेता के रूप में निर्वाचन, उससे नीतीश कुमार को उम्मीद थी कि साथ सरकार गठन के बाद भी घटक दलों की बैठकें होती रहेंगी. लेकिन वो चाहे धारा 370 हो या नया नागरिकता क़ानून, सहयोगी दल के रूप में उन्हें बताने की भी औपचारिकता का कभी निर्वाह नहीं किया गया. ऐसा उनके समर्थक बताते हैं.
  9. जब 2017 जुलाई के बाद नीतीश कुमार को उम्मीद थी कि केंद्र सरकार केंद्रीय योजनाओं में जो बिहार का भार है वो कम करेगी. वह कुछ ऐसे उपाय करेगी जिससे बिहार को विशेष आर्थिक सहायता मिल जाए. लेकिन आज तक केंद्र सरकार ने उनकी मांगों को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया. शायद यही कारण है कि अब वो दिल्ली यात्रा के दौरान अलग-अलग केंद्रीय मंत्रियों से मुलाक़ात की औपचारिकता भी नहीं करते.
  10. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब महागठबंधन की सरकार तोड़ कर BJP के साथ हाथ मिलाया था तब उन्होंने अपने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वो तैयारी करें, जल्द ही प्रधानमंत्री के स्तर पर बिहार के विकास और समस्याओं को लेकर बैठक होगी. लेकिन ढाई साल बाद अभी भी अधिकारी उस बैठक का इंतज़ार कर रहे हैं. यह दिखाता है न कि केंद्र सरकार नीतीश कुमार को बहुत ज़्यादा गंभीरता से नहीं लेती. उसे केवल बिहार में सत्ता में भागीदारी चाहिए थी. वो विकास और नीतीश दोनों को दूर रखना चाहते हैं क्योंकि दोनों का क्रेडिट उन्हें नहीं मिलेगा.

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