जनपथ न्यूज़  दिल्ली चुनाव :- मानचित्र पर दिल्ली देश के दिल में है। अब यहां की राजनीति के साथ यही बात लागू होती है। दिल्ली के दंगल ( Delhi Election ) में कौन बाजी मारेगा ये 11 फरवरी को पता चलेगा। वैसे जनमत ईवीएम में कैद हो चुका है। इसकी गूंज सिर्फ दिल्ली नहीं बल्कि पटना तक सुनी जाएगी। इसका खास कारण भी है और इतिहास भी। शायद इसीलिए भारतीय जनता पार्टी ( Bhartiya Janata Party ) ने दिल्ली चुनाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया। मुकाबला आम आदमी पार्टी ( Aam Aadmi Party) से है। कांग्रेस ( Congress ) ने उम्मीदें छोड़ दी है।
आकार में दिल्ली बेशक छोटी है। इसके बावजूद यहां की 70 सीटें देश की राजनीतिक दिशा तय करने वाली साबित हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( Narendra Modi ) के विरोध की राजनीति के लिहाज से ये अहम है। हालांकि इसकी धुरि में कांग्रेस का न होना उसके लिए त्रासदी है। वहीं अरविंद केजरीवाल ( Arvind Kejriwal ) का डटे रहना क्षेत्रीय दलों के लिए उम्मीदें कायम करता है।
अब पिछले कुछ महीनों की राजनीति देखिए। खास कर तीन तलाक खत्म करने वाले कानून, धारा 370 हटाने के फैसले और एनआरसी को लेकर मचे बवाल के बाद राजनीतिक ध्रुवीकरण चरम पर है। इस दौरान हरियाणा में बीजेपी हारत-हारते सत्ता बचा पाई। महाराष्ट्र में तो सरकार से बाहर ही हो गई। झारखंड में भी झटका लगा है। ऐसे में दिल्ली का नतीजा बेहद अहम साबित होने वाला है।
2015 जैसे राजनैतिक हालात
कुछ मामलों में 2015 के घटनाक्रम से मौजूदा हालात की तुलना की जा सकती है. हालांकि तब बीजेपी ने झारखंड और महाराष्ट्र में जर्बदस्त जीत हासिल की थी। मध्य प्रदेश और राजस्थान भी बीजेपी के पाले में था। पर उसके बावजूद बीजेपी को दिल्ली के दंगल में करारी मात मिली थी। पीएम नरेंद्र मोदी और तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह के जोरदार प्रयास के बावजूद बीजेपी को करारी हार मिली. ऐसा मोदी के सत्ता में आने के महज नौ महीने बाद हुआ था।
उस हार ने बीजेपी विरोधियों को ढाढस बंधाया था। वो एकजुट हुए। बिहार में पहली बार महागठबंधन ( Mahagathbandhan ) का प्रयोग हुआ। वहां बीजेपी को मोदी लहर से काफी उम्मीदें थीं। खुद मोदी ने नीतीश के खिलाफ ताबड़तोड़ प्रचार किया था। नतीजे पलट गए और लालू यादव ( Lalu Yadav ) – नीतीश कुमार ( Nitish Kumar ) ने बीजेपी को पटखनी दे दी। हालांकि दो साल बाद ही नीतीश ने लालू से रिश्ता तोड़ लिया था। अब वो फिर बीजेपी के साथ हैं। पर, महागठबंधन बरकरार है।
तो साफ है कि दिल्ली के नतीजों की गूंज पटना में सुनी जाएगी। बिहार के लिए 2020 चुनाव का साल है। अक्टूबर-नवंबर में विधानसभा चुनाव होने हैं। जिस प्रशांत किशोर ने महागठबंधन के लिए 2015 की स्ट्रैटेजी बनाई थी, वो केजरीवाल के लिए काम कर रहे हैं। 11 फरवरी यानी जिस दिन दिल्ली के नतीजे आएंगे, उसी दिन पटना में बड़ा एलान करने वाले हैं। ये सारे संकेतक इस बात की तस्दीक करते हैं कि केजरीवाल की कुर्सी का जाना या बचना पीएम नरेंद्र मोदी, उनकी पार्टी बीजेपी और विपक्ष के लिए क्या मायने रखता है।
एग्जिट पोल के नतीजों से तो लगता है कि दिल्ली फिर केजरीवाल के साथ जा रही है. आप को 45 से 57 सीटें मिलने का अनुमान जताा जा रहा है. अगर नतीजे वाकई इसी के हिसाब से आए तो खुश सिर्फ केजरीवाल नहीं होंगे। धूल चाटने जा रही कांग्रेस और पटना में दिल्ली के नतीजों पर टकटकी लगाए बैठे तेजस्वी यादव भी जश्न मनाएंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published.