जनपथ न्यूज डेस्क

Written by: गौतम सुमन गर्जना, भागलपुर
15 अक्टूबर 2022

भागलपुर : महात्मा गांधी का फ़ोटो लेकर बिहार के चम्पारण से पद यात्रा की शुरूआत करने वाले प्रशांत किशोर जी का आखिर मक़सद क्या है, यह अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। भले ही प्रशांत किशोर गाँधी का नाम लेते हों, लेकिन गाँधी को गाली दिये जाने को लेकर अभी तक उन्होंने मुँह नहीं खोला है। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बेहतर रिश्ता गाँधी को अपने प्राण से ज़्यादा प्यारा था। कहा जाता है कि इसी वजह से हिंदू कट्टरपंथी उनसे नफ़रत करते थे और उनकी हत्या की वजह भी यही बताई जाती है।
आज देश में मुसलमानों के विरूद्ध नफ़रत फैलाकर हिंदुओं को वोट बैंक के रूप में तब्दील कराने का अभियान चलाया जा रहा है और इसमें कुछ हद तक सफलता भी मिली है। बहरहाल अपनी पद यात्रा में इस अभियान की निंदा का एक शब्द भी प्रशांत किशोर के मुँह से अब तक सुनने को नहीं मिला है।

उनके निशाने पर लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव हैं। जब वे तेजस्वी की पढ़ाई लिखाई को लेकर उनका उपहास उड़ाते हैं, तो मैं अपने को असहज महसूस महज इसलिये करने लगता हूँ कि किसी तरह मैंने इंटरमीडियेट की परीक्षा तीसरे डिविज़न से पास की थी। मेरे भाई-बहनों की पढ़ाई हाई स्कूल से आगे नहीं बढ़ी। लेकिन उनको बिहार का सफल प्रधानमंत्री माना जाता है, जिनकी डिग्रियों का ये तक पता नहीं कि वह असली है या नकली। लेकिन खुद को चाय बेचने़ वाला बताकर आज अपने अरबपति मित्रों के सहारे देश पर न केवल हुकूमत कर रहे हैं बल्कि लोकतंत्र का माखौल उड़ाकर पुरे देश को नचनिया की तरह नचा रहे हैं।
कामराज नाडार का नाम प्रशांत जी ने ज़रूर सुना होगा, स्कूली पढ़ाई ना के बराबर, अंग्रेज़ी का यस और नो शब्द से ज़्यादा का ज्ञान उनको नहीं था, लेकिन कांग्रेस के इतिहास में सबसे ताकतवर नेताओ में उनकी गिनती होती है। इंदिरा गांधी को उन्होंने ही प्रधानमंत्री बनवाया था। इसलिए प्रशांत जी से इतनी समझ की अपेक्षा तो थी कि वे समझ पाते कि चुनाव में मतदाता डिग्री देखकर वोट नहीं देता है। तेजस्वी बिहार की राजनीति में एक ताक़त के रूप में स्थापित हैं। बताते चले कि लालू यादव की ग़ैर हाज़िरी में 2020 के विधानसभा चुनाव में राजद का नेतृत्व तेजस्वी ने ही किया था और उसका नतीजा भी सबके सामने है।

इसलिए इन बातों को छोड़कर प्रशांत जी को बताना चाहिए कि उनकी राजनीति क्या है ? क्या वे गाँधी को गाली देने वालों के साथ हैं ? देश में आज मुसलमानों के विरूद्ध जो नफ़रत और घृणा का अभियान चलाया जा रहा है, क्या उनका वे समर्थन कर रहे हैं। क्योंकि बिहार की राजनीति में अबतक किसी भी राजनीतिक दलों ने अपने राजनीतिक अभियान की इतनी महँगी शुरुआत नहीं की होगी, जैसा कि प्रशांत किशोर ने किया है।
अब तक गाँधी को खलनायक और नाथूराम गोडसे को नायक बताने वालों की राजनीति के विषय में प्रशांत जी ने अपना मुँह नहीं खोला है। न ही उन्होंने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के विरोध में कुछ बोला है, आखिर क्यों… इस यात्रा के दौरान लोगों के बीच उन्हें अपने मनसा जरूर उजागर करनी चाहिए।

अपनी पदयात्रा में अब तक वे लालू , नीतीश और तेजस्वी को ही जमकर गरियाते सुने गये हैं। प्रशांत ने अपने चुनावी प्रबंधन की शुरुआत नरेंद्र मोदी जी के 2014 के चुनाव से ही की थी। कहीं ऐसा तो नहीं कि मोदी जी के प्रति उनका पुराना प्रेम उमड़ गया है और, बिहार, जहाँ से मोदी जी को गंभीर चुनौती मिल रही है उस चुनौती को कमजोर करने की उन्होंने सुपारी ले ली है… ?

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