जनपथ न्यूज डेस्क
Written by: गौतम सुमन गर्जना/भागलपुर
Edited by: राकेश कुमार
2 अप्रैल 2023

नीतीश कुमार प्रेशर पाॅलिटक्स के माहिर खिलाड़ी माने जाते हैं। नीतीश दूसरों का सहयोग लेकर सरकार तो चलाते हैं, पर खुद के बड़े भाई होने का एहसास भी सहयोगियों को कराते रहते हैं। साथी चाहे बीजेपी हो या आरजेडी, उनकी प्रेशर पाॅलिटिक्स सब पर समान रूप से हावी रहती है। वे बिदकते या नाराज होते हैं, तो समझ जाइए कि वे अपनी कोई बात मनवाने वाले हैं। अगले साल यानी 2024 में लोकसभा का चुनाव होने वाला है। 2025 में बिहार विधानसभा के लिए वोट पड़ेंगे। नीतीश का प्रेशर पाॅलिटिक्स का पैंतरा अभी से चालू है। सीटों के बारगेन के लिए उनकी ऐसी कवायद अक्सर दिखती रही है।

*जब बीजेपी को अपनी 5 सीटें छोड़ने पर मजबूर किया*

बीजेपी ने 2014 में बिहार में लोकसभा की 40 में 22 सीटें अकेले जीती थीं। नीतीश कुमार की जेडीयू को सिर्फ 2 सीटें ही मिली थीं। 2017 में लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी का साथ छोड़कर नीतीश ने बीजेपी से रिश्ता गांठ लिया था। बहरहाल, 2019 के लोकसभा चुनाव में जब एनडीए के घटक दलों के बीच सीटों के बंटवारे का सवाल उठा तो नीतीश के शागिर्दों ने बीजेपी पर दबाव बनाना शुरू किया कि देश में भले नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव होगा, लेकिन बिहार में नीतीश ही बड़े भाई के रूप में एनडीए का नेतृत्व करेंगे। इसके पीछे की मंशा यह थी सीटों के बंटवारे में बड़े भाई के रूप में उनकी पार्टी को बीजेपी से अधिक सीटें मिलें। उनकी प्रेशर पालिटिक्स का नतीजा रहा कि बीजेपी को अपनी जीती 5 सीटें नीतीश के नाम कुर्बान करनी पड़ीं। 2014 में 2 सीटों पर जीतने वाले जेडीयू ने बीजेपी पर दबाव बना कर उसके बराबर यानी 17 सीटें हथिया लीं। चुनाव में जेडीयू के 16 उम्मीदवार जीत भी गये।

*एमएलसी चुनाव में भी नीतीश ने बीजेपी पर बनाया दबाव*

2021 में बिहार में एमएलसी की 24 सीटों पर चुनाव होना था। यह तबका वक्त था,जब नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू की विधानसभा में महज 43 सीटें ही थीं। बीजेपी एनडीए की सबसे बड़ी पार्टी थी, जिसके जेडीयू से ड्योढ़े विधायक थे। बीजेपी पर दबाव बना कर नीतीश ने बराबरी कर ली। समझौता तो 13-11 का हुआ, लेकिन जेडीयू ने बीजेपी पर दबाव डाल कर उसके कोटे की 13 में से एक सीट पशुपति पारस की पार्टी को दिलवा कर अपना रुतबा बरकरार रखा। हालांकि नीतीश के बड़े भाई का मिथ बीजेपी ने एक सीट अधिक रख कर तोड़ दिया। तब तक बड़े भाई की भूमिका का निर्वहन नीतीश ही कर रहे थे। उन्होंने लोकसभा और विधानसभा की तरह बराबर-बराबर सीटों पर दावेदारी पेश की थी। आखिरकार बीजेपी से 11 सीटें झटकने में नीतीश कामयाब हो गये थे।

*2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के बराबर हिस्सा लिया*

नीतीश कुमार ने लालू यादव को छोड़कर बीजेपी के साथ आने का भरपूर फायदा उठाया। विधानसभा के चुनाव में भी नीतीश ने बीजेपी के बराबर सीटें लीं। उनका तर्क था कि लोकसभा चुनाव में जिस तरह 50-50 प्रतिशत पर बंटवारा हुआ था, उसी पैटर्न पर विधानसभा की सीटें भी बंटें। एनडीए के साथ आये मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी और जीतन राम मांझी के हम को दोनों दलों (बीजेपी और जेडीयू) ने अपने-अपने कोटे से 4-4 सीटें दीं। हालांकि इस बार नीतीश गच्चा खा गये। लड़े तो बीजेपी के बराबर सीटों पर, लेकिन जीत पाये महज 43 सीटें। कम सीटें आने के लिए उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के नेता चिराग पासवान को दोषी ठहराया, जिन्होंने जेडीयू के उम्मीदवारों के खिलाफ अपने कैंडिडेट उतार दिये थे। नीतीश का मानना था कि चिराग पासवान को बीजेपी की शह थी। तभी चिराग ने बीजेपी के कोटे वाली सीटों पर उम्मीदवार नहीं दिये, लेकिन जेडीयू को नुकसान पहुंचाया।

*प्रेशर पालिटिक्स का नतीजा था महागठबंधन से अलग होना*

बड़े तामझाम से जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने महागठबंधन बना कर नीतीश ने 2015 का विधानसभा चुनाव लड़ा और कामयाबी भी हासिल की। अधिक सीटें आने के बावजूद आरजेडी ने नीतीश को सीएम बना दिया। लेकिन दो साल के अंदर ही सरकार पर आरजेडी के बढ़ते दबाव को नीतीश झेल नहीं पाये। पहले तो उन्होंने आरजेडी को इशारों में समझाने की कोशिश की, बाद में तेजस्वी यादव के खिलाफ सीबीआई केस होने पर उन्होंने उन पर जनता के बीज जाकर सफाई देने का दबाव बनाया। बाद में आरजेडी से अलग ही हो गये और बीजेपी के साथ 2017 में सरकार बना ली। लालू यादव कुछ समझ पाते, तब तक नीतीश ने अपना खेल कर दिया था।

*अब दिखने लगा है आरजेडी पर नीतीश के प्रेशर का असर*

नीतीश कुमार अपने 43 विधायकों को लेकर अब महागठबंधन के साथ हैं। महागठबंधन में भी आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी है। नीतीश के विधायकों से दोगुने से थोड़ा कम तेजस्वी यादव के विधायक हैं। लालू ने नीतीश को इसके बावजूद सीएम बना दिया था। तब लालू ने कहा था कि नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति करेंगे। वे बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को लामबंद करेंगे। नीतीश ने इसकी शुरुआत भी की, लेकिन कोई खास कामयाबी नहीं मिली। उसके बाद वे चुप बैठ गये, लेकिन आरजेडी की ओर से तेजस्वी को सीएम बनाने और नीतीश को विपक्षी एकता की मुहिम में लगने का दबाव बढ़ने लगा। आरजेडी कोटे के मंत्री भी निरंकुश होकर बयानबाजी करने लगे। नीतीश ने बीजेपी एमएलसी संजय मयूख के घर जाकर आरजेडी की हवा निकाल दी। रामचरित मानस पर अटपटा बयान देकर नीतीश को नाराज करने वाले शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने अगर नीतीश के अचानक पांव छुए तो इसके पीछे उनकी प्रेशर पाॅलिटिक्स ही है।

*भाजपा की तरह राजद से भी बराबर सीटें चाहते हैं नीतीश*

दरअसल नीतीश कुमार की प्रेशर पालिटिक्स एक बार फिर इसलिए शुरू हुई है कि अगले साल लोकसभा के चुनाव होने हैं। नीतीश को पिछली बार बीजेपी ने अपने बराबर सीटें दी थीं। आरजेडी से भी नीतीश उसी पैटर्न पर बराबर या अधिक सीटें चाहते हैं। जाहिर है कि नीतीश ने जो 16 सीटें जीती थीं, उन पर उनकी दावेदारी तो रहेगी ही। अब चूंकि कांग्रेस कैंप से जो जानकारियां मिल रही हैं, उसमें कांग्रेस 10 सीटें चाहती है। महागठबंधन में सात दल हैं तो सबको थोड़ा-बहुत हिस्सा तो चाहिए ही। इसलिए अभी से नीतीश आरजेडी पर दबाव की राजनीति कर रहे हैं कि लोकसभा सीटों के लिए बारगेन में सहूलियत हो।

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