जानिए कैसे लाचारगी के भंवर में फंसी मुख्यमंत्री की नैया

न्यूज डेस्क पटना
जनपथ न्यूज
Reported by: गौतम सुमन गर्जना
Edited by: राकेश कुमार
24 दिसंबर 2022

भागलपुर/पटना: जोड़-तोड़ और साथी बदल-बदल कर नीतीश कुमार बिहार की कमान 2005 से लगातार अपने हाथ में रखे हुए हैं। इन 17 सालों में ज्यादातर समय वह भाजपा के साथ रहे हैं। दो मौके ऐसे आये, जब नीतीश ने राजद को अपना साथी बनाया। पहली बार तो 17 महीने में ही राजद से उन्होंने किनारा कर लिया था और पुराने साथी भाजपा के साथ जाना पसंद किया। 2020 के असेंबली चुनाव में नीतीश कुमार को राजद के उभार से नीतीश कुमार को अपनी असली औकात का आभास हुआ। नीतीश कुमार की पार्टी जदयू की सीटें 43 पर सिमट गयीं, जबकि राजद ने सर्वाधिक सीटें हासिल कर नंबर वन का रुतबा हासिल कर लिया। अपनी इस दुर्गति का मूल कारण तलाशे बगैर नीतीश ने अपरोक्ष तौर पर भाजपा को इसके लिए जिम्मेवार मान लिया। यह भी अनुमान लगा लिया कि भाजपा की शह पर लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान ने उनकी पार्टी की लुटिया डुबोई। तभी से उनके मन में भाजपा के प्रति खटास की नींव पड़ गयी थी।

नीतीश अपनी चालाकी से भरोसेमंद साथी खोते रहे हैं : नीतीश कुमार अंतरात्मा की आवाज पर निर्णय लेने की अपनी छवि का इजहार हमेशा करते रहे हैं। यही वजह है कि 2015 में राजद ने कम सीटें मिलने के बावजूद उन्हें वादे के मताबिक मुख्यमंत्री बना दिया। लेकिन 17 महीने में उनका असली चरित्र उजागर हो गया, जब वह राजद के नेता तेजस्वी पर केंद्रीय जांच एजेंसियों द्वारा लगाये गये आरोपों पर सफाई मांगने लगे और इसे ही आधार बना कर उन्होंने किनारा कर लिया। एक बार फिर पुराने साथी भाजपा के साथ उन्होंने सरकार बना ली। अब उन्हें तेजस्वी की खामियां नजर नहीं आतीं। उन्हें बार-बार एहसास करा रहे हैं कि अब तेजस्वी के नेतृत्व में ही विधानसभा के चुनाव होंगे। तेजस्वी ही बिहार को आगे बढ़ाएंगे। लेकिन जिस राजद ने उनका चरित्र देख कभी पलटू राम तो कभी कुर्सी कुमार का तमगा उन्हें दिया था, उसे भरोसा नहीं हो रहा। यही वजह है कि बिहार में बढ़ते अपराध या सारण में जहरीली शराब से मौतों को देखते हुए महागठबंधन के नेता ही उनसे खफा हो गये हैं। राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह के बेटे सुधाकर सिंह ने तो नीतीश के खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया है। अब तो जगदानंद सिंह भी उनसे तेजस्वी के लिए बिहार की गद्दी छोड़ने की सलाह दे रहे हैं। जहरीली शराब से मौतों पर मुआवजे के लिए महागठबंधन के घटक दल भाकपा (माले) ने भी मोर्चा खोल दिया है। सच तो यह है कि नीतीश की पार्टी के भीतर भी मुआवजे को लेकर एक राय नहीं हैं।

जगदानंद सिंह नीतीश को क्यों दे रहे सलाह : नीतीश कुमार जब महागठबंधन के साथ सरकार बनाने के लिए कवायद में जुटे थे,तभी यह चर्चा आम थी कि राजद ने यह शर्त रखी है कि बिहार की बागडोर तेजस्वी को सौंपिये और खुद नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने के काम में लगिए। कहा तो यह भी गया कि गुजरात-हिमाचल विधानसभा चुनाव के बाद नीतीश विपक्ष की एकजुटता के प्रयास में लग जाएंगे। इसके लिए पहले वे सोनिया गांधी, सीताराम येचुरी, केसीआर, शरद यादव जैसे नेताओं से मिल चुके थे। जदयू के भीतर से भी यह आवाज आने लगी कि नीतीश में पीएम बनने की पूरी क्षमता और योग्यता है। अनुमान था कि 2023 में नीतीश अपने को बिहार की राजनीति से मुक्त कर लेंगे और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह तलाशेंगे। इस बीच नीतीश ने अपना दांव चल कर आरजेडी को हतप्रभ कर दिया। उन्होंने तेजस्वी की मौजूदगी में नालंदा की एक सभा में उनके कशीदे तो काढ़े, लेकिन पेंच यह कह कर फंसा दिया कि 2025 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। उसके बाद ही राजद नेताओं के कान खड़े हो गये।

जगदानंद की बेबाक सलाह : लालू प्रसाद यादव के भरोसेमंद साथी और फिलवक्त राजद के बिहार प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने नीतीश को सलाह दे डाली है कि उन्हें अब अब बड़ा बन कर दिखाना चाहिए। उन्होंने उदाहरण भी दिया कि जिस तरह विश्वनाथ प्रताप सिंह ने यूपी की सत्ता का मोह छोड़ राष्ट्रीय फलक की राजनीति की और पीएम की कुर्सी तक पहुंचे, वैसा ही काम नीतीश को शुरू करना चाहिए। जगदानंद को जानने वाले यह बात अच्छी तरह समझते हैं कि वे कुछ भी लालू की सहमति के बगैर नहीं बोलते या खुद से कुछ बोलते भी हैं तो उसे लालू की रजामंदी मिल जाती है। लालू अभी किडनी प्रत्यारोपण के लिए सिंगापुर में हैं। अगले माह वह लौटने वाले हैं। इसलिए जगदानंद सिंह की सलाह को हल्के में नहीं लेना चाहिए।

राजद इतनी हड़बड़ी में क्यों दिखता है : नीतीश कुमार ने राजद के साथ मिलकर सरकार तो बना ली, लेकिन वे कब गच्चा दे जायें, इस पर राजद नेताओं को भरोसा नहीं हो रहा। एक तो नीतीश ने भाजपा का साथ छोड़ राजद से मिलकर सरकार बनाने से पहले यही योजना बनाई थी कि वह केंद्र की राजनीति करेंगे। उनके निशाने पर राजद की ही तरह नरेंद्र मोदी होंगे। वह छह महीने बाद विपक्ष को एकजुट करने के प्रयास में लगेंगे। शुरुआती दिनों में उन्होंने पहल भी की। लेकिन मुहिम में आशातीत सफलता नहीं मिलने से उनका मनोबल कमजोर हुआ है। विपक्ष की ओर से पीएम पद की दावेदारी में कांग्रेस, ममता बनर्जी जैसे दल-नेता सबसे बड़ी बाधा हैं। इसलिए उन्होंने बीच का रास्ता अख्तियार करने में ही भलाई समझी हो। इसीलिए वे अब 2025 का राग अलापने लगे हैं। हालांकि, उनकी ही पार्टी में उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेताओं ने इस पर सवाल खड़ा कर दिया है, जो खुद नीतीश की गैरमजूदगी में बिहार का सीएम बनने का सपना देखते रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा ने तो साफ कह दिया कि 2025 के पहले 2024 पर ध्यान देने की जरूरत है। इन्हीं सब कारणों से नीतीश फिलवक्त फजीहत के दौर से गुजर रहे हैं।

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