मुसलमानों में खत्‍म हो रहा है भाजपा का डर

जनपथ न्यूज डेस्क
गौतम सुमन गर्जना/भागलपुर
Edited by: राकेश कुमार
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24 दिसंबर 2022

बिहार में सबसे बड़ी आबादी मुसलमानों की है। अहीरों से भी एकाध प्रतिशत ज्‍यादा। तथाकथित सवर्ण जातियों की समग्र आबादी से भी अधिक। इसलिए इस जाति या धर्म का राजनीतिक महत्‍व कुछ ज्यादा है और इसे सभी पार्टियां स्‍वीकार करती हैं, लेकिन इसकी महत्ता दो पक्षीय है। धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वाले लोग मुसलमानों पर अपना हक समझते हैं, जबकि सांप्रदायिकता की राजनीति करने वाले लोग मुसलमानों के खिलाफ गोलबंदी पर अपनी राजनीति करते हैं। सांप्रदायिकता या धर्मनिरपेक्षता शुद्ध राजनीतिक अवधारणा है। इसकी व्‍याख्‍या समय और परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती है।

बिहार में मंडल आंदोलन के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी ने कमंडल आंदोलन की शुरुआत की थी। भाजपा का टारगेट मुसलमान और उनका धार्मिक सरोकार होता था। इसी कारण राम मंदिर, धारा 370 और समान ना‍गरिक संहिता जैसे मुद्दे भाजपा के लिए महत्‍वपूर्ण थे। उधर, 1994 में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ नीतीश कुमार ने लड़ाई की शुरुआत की। इस लड़ाई के केंद्र में था यादवों के खिलाफ नफरत की राजनीति.इसमें कुर्मी-कोईरी के साथ अतिपिछड़ा और मुसलमानों की गोलबंदी थी। कालांतर में इस गठजोड़ के साथ भाजपा की साझेदारी बढ़ी। इस कारण सवर्णों के साथ कोईरी-कुर्मी के साथ अतिपिछड़ों की राजनीतिक युगलबंदी का दौर शुरू हुआ। इस दौर में नीतीश कुमार के साथ लालू प्रसाद यादव को छोड़ने वाले मुसलमान राजद में वापस आने लगे। इसी दौर में माई समीकरण ताकतवर बनकर उभरी। 1997 से 2007 तक माई की ताकत अपने चरम पर थी। इसी एक दशक में लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक चमक राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्‍ली तक दिखी.इसके बाद मुसलमानों का लालू प्रसाद यादव के राजद से मोहभंग होने लगा। 2009 के लोकसभा और 2010 के विधान सभा चुनाव में राजद हाशिये की पार्टी बन गई और तब लोकसभा में 4 और विधान सभा में राजद 22 सीटों पर सीमटकर रह गई थी।

दरअसल, मुसलमान राजनीति की छटपटाहट बढ़ती जा रही थी और वे अपने लिए खास जगह भी तलाश रहे थे। इसी परिप्रेक्ष्‍य में मुसलमानों ने 2010 में भाजपा उम्‍मीदवारों को भी वोट किया.यह पहला पड़ाव था, जब मुसलमानों में भाजपा का भय समाप्‍त होते हुए दिखा। पंचायती राज व्‍यवस्‍था में अतिपिछड़ों के आरक्षण का लाभ लेने वालों में बड़ी संख्‍या मुसलमानों की भी थी। 80 फीसदी से अधिक मुसलमान अतिपिछड़ी जाति की श्रेणी में आते हैं और उन्‍हें पंचायती राज में आरक्षण का लाभ मिला था। अतिपिछड़ों के आरक्षण के बाद पहला विधान सभा चुनाव 2010 में ही हुआ था, जिसमें राजद के नेता को नेता प्रतिप‍क्ष का दर्जा मुख्‍यमंत्री की अनुकंपा पर मिला था।

2020 का विधान सभा चुनाव मुसलमान राजनीति के लिए मील का पत्‍थर साबि‍त हुआ। इस चुनाव में पहली बार मुसलमानों के हित की वकालत करने वाली पार्टी एआईएमआईएम (मीम) के 19 में से 5 उम्‍मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे। ये पांचों सीट 3 अलग-अलग जिलों की हैं, जिनमें पूर्णिया जिले की अमौर और बायसी, किशनगंज की बहादुरगंज और कोचाधामन तथा अररिया जिले की जोकीहाट सीट शामिल हैं। कई सीटों पर मीम उम्‍मीदवारों को 10 हजार से अधिक वोट मिले। हालांकि विधान सभा चुनाव में मीम ने राजद के किसी बड़े नेता के खिलाफ उम्‍मीदवार नहीं दिया था। इसके बावजूद दरभंगा,मधुबनी, सहरसा, मधेपुरा और सुपौल की 33 सीटों में से राजद सिर्फ 5 सीट जीत पाए। यह इलाका यादव और मुस्लिम प्रभाव वाला माना जाता है। इन 33 में से सिर्फ छातापुर में मीम ने उम्‍मीदवार दिया था।

अब सवाल उठता है कि क्‍या धर्मनिरपेक्ष दलों से मुसलमानों का भरोसा उठने लगा है…क्‍या वे अब नये विकल्‍प की तलाश में हैं…क्‍या उनके अंदर से भाजपा का भय समाप्‍त हो चुका है…ऐसे और भी कई सवाल हैं, जो मीम की जीत से जुड़ी हुई हैं और मीम की प्रासंगिकता को बढ़ा रही है। हाल में ही, गोपालगंज सीट पर भाजपा 1794 हजार वोट से जीत हासिल की और इस सीट पर मीम के उम्‍मीदवार को 12214 वोट मिले थे। कुढ़नी उपचुनाव में मीम को 3202 वोट मिले और जदयू की पराजय 3632 से हुई।

इन समीकरणों के बनने-बिगड़ने वाले खेल में अब सवाल यह भी उठ रहा है कि क्‍या मुसलमानों में भाजपा का डर समाप्‍त हो रहा है ? मुसलमान यदि राजद, कांग्रेस या जदयू के विकल्‍प के रूप में मीम को स्‍वीकार कर रहे हैं तो इसका आशय यह है कि ये पार्टियां उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने में विफल रही हैं। इसलिए मीम जैसी नई और मुसलमान सरोकार की बात करने वाली पार्टी को मुसलमान अपना विकल्‍प मान रहे हैं। वे इसके पक्ष में मतदान भी कर रहे हैं और इसकी सफलता की दर भी महागठबंधन में शामिल कांग्रेस के बराबर रही है। मीम के 19 में 5 उम्‍मीदवार जीत हासिल करते हैं और कांग्रेस के 70 में से 19 उम्‍मीदवार जीत दर्ज करते हैं। सफलता की यह दर लगभग बराबर है। इसलिए मीम को सिर्फ वोटकटवा कह कर उसकी ताकत को अब नजरअंदाजन नहीं किया जा सकता है और उसके सरोकार को नकारा नहीं जा सकता है।

इधर, भाजपा ने पसमांदा मुसलमानों के बीच पैठ बनाने की शुरुआत की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ महीने पहले पार्टी के एक कार्यक्रम में कहा था कि सरकार की योजनाओं का लाभ पसमांदा मुसलमानों को मिल रहा है और उन्‍हें पार्टी के साथ जोड़ना चाहिए। इसी परिप्रेक्ष्‍य में भाजपा के विधान पार्षद और पूर्व केंद्रीय राज्‍यमंत्री संजय पासवान ने एक कार्यक्रम पटना में किया था और तब इसमें बड़ी संख्‍या में पसमांदा मुसलमानों ने हिस्‍सा लेकर अपना पक्ष रखा था। इस कार्यक्रम में भाजपा नेता राम माधव ने कहा कि वे पार्टी के मंच पर उनकी अपेक्षाओं को रखेंगे।

मीम की बढ़ती ताकत और स्‍वीकार्यता इस बात का प्रमाण है कि मुसलमानों में भाजपा का भय समाप्‍त होने लगा है। अभी भी वे भाजपा को वोट देने से परहेज कर रहे हैं, लेकिन भाजपा के विरोध में मुसलमान नये विकल्‍प तलाश रहे हैं। उन्‍हें इस बात का डर नहीं है कि भाजपा के आने से उनका क्‍या नुकसान होगा। वे मानते हैं कि सरकार चाहे जिस पार्टी की बने, उनके सामाजिक और राजनीतिक अधिकार भारतीय संविधान में संरक्षित और सुरक्षित हैं। मुसलमान अब भय की जगह भरोसे की राजनीति करने में विश्‍वास कर रहे हैं। उन्‍हें खुद और अपने सरोकार व हित पर भरोसा है। उन्‍हें लगता है कि किसी पार्टी में किसी जाति या धर्म विशेष को टिकट मिलना या नहीं मिलना एक सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति है.यह किसी के अधिकार हनन का प्रयास नहीं है।

बदली हुई परिस्थिति में भाजपा ने भी मुसलमानों को साधने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। उसने पसमांदा मुसलमानों को अपना टारगेट बनाया है.भाजपा शाहनवाज हुसैन जैसे सवर्ण मुसलमानों को ढोती रही है, लेकिन अब पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने का अभियान चला रही है। भय की जगह भरोसा हासिल कर अपना आधार बढ़ाना चाहती है। भाजपा की यह रणनीति धर्मनिरपेक्ष दलों के‍ लिए चुनौती साबित हो सकती है।

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