जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना ::

यह सही है कि रुद्राक्ष धारण करने वाले को ब्रह्मत्व, रुद्रत्व और सत्य संकल्प की प्राप्ति होती है। जो रुद्राक्ष धारण करता है, उसे रुद्र रूप ही समझना चाहिए इसमें किसी प्रकार का संसय नहीं होनी चाहिए।

यह भी सही है कि रुद्र+अक्ष = रुद्राक्ष होता है और रुद्र अर्थात् शिव और अक्ष अर्थात् आँसू भी होता है।

शिव पुराण के अनुसार सदाशिव ने लोकोपकार के लिए पार्वती जी से कहा कि हे देवि, मैंने पूर्व समय मन को स्थिर कर दिव्य सहस्त्र वर्ष पर्यन्त तपस्या की थी। उस समय मुझे कुछ भय सा लगा- जिससे मैने अपने नेत्र खोल दिये, मेरे नेत्र खुलने पर नेत्रों से आँसुओं की वुन्दें गिरने लगी, और यह बुंद पृथ्वी पर वृक्ष का रूप लेने लगा, बाद में इसे रुद्राक्ष के रुप में जाना गया। इस वृक्ष में जो फल लगता है उसे रुद्राक्ष का फल कहा जाता है। रूद्राक्ष भगवान शिव को सबसे अधिक प्रिय है। शिवपुराण के अनुसार इसे धारण करते समय भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए।

*एकमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय मुक्ता के समान, मेघजल सदृश, लालमुखी, पाँच मुखवाले, त्रिनेत्री, चंद्रधारी, अनेक आयुधधारी, सर्प, तोता, घण्टा, धारण करने वाले, हाथों में कमल लिये हुए भगवान शिव का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ हृीं नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*दोमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय त्रिनेत्री, नीलकण्ठ वाले, चंद्रकांति समान, आयमुद्राधारी, चक्र, धनुष, चन्दमा को धारण करने वाले भगवान शिव का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*तीनमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय अष्टशक्तिधारी, जवा पुष्प के समान वर्ण वाले, स्वर्णवर्णीय पद्मासन पर आरूढ़, तेजोमय भगवान शिव का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ क्लीं नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*चारमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय सृष्टि के स्वामी चर्तुमुखी शिव के चरणों में शीश झुकाते हुए प्रणाम तथा इनका ध्यान करते हुए ‘‘ॐ हृीं नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*पांचमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय भयावह हाव-भाव वाले, द्वादश, मुंड, कमल एवं त्रिशुलधारी शिव का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ हृीं उमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*छहमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय क्रौंच पर्वत को विदीर्ण करने वाले, दानवों के संहारक भगवान शिव का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ हृीं हूं नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*सतमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय कमलवत नेत्रों वाले, अडहुल (बंधूक पुष्प) की आकृति वाले, कूर्म की पीठ पर स्थित भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए ‘‘ॐ हूं नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*आठमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय हे कुल के देवता गणेश जी, आप मेरे विध्नों का शमन करें। इस प्रकार प्रार्थना करते हुए गणेश जी का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ हूं नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*नौमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय जिनके हाथों में कपाल सुशोभित है। जो सर्पो का जनेऊ धारण किये है, जिनका रंग श्यामल है, जो दंड लिये हुए हैं, उन त्रिनयन सभी की मनोकामना पूर्ण करने वाले भैरव का स्मरण करते हुए ‘‘ॐ हृीं हूं नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*दसमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय करोड़ों शरद-चक्र सम कांतियुक्त, शंख, चक्र, गदा एवं श्वेत कमल, पुष्पधारी तथा श्वेत कमल पर आरूढ़ तेजोमय, सृष्टि को मोह लेने वाले भुजाओं में बंद, हार, कुण्डल, कंकन, धारण करने वाले चन्द्रमा के समान शोभित कौस्तुभ मणिधारक भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ हृीं हूं नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*ग्यारहमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय बालसूर्य के समान तेजवान, जटा में चन्द्रमा को धारण करने वाले सर्पाभूषणधारी, हाथों में माला, त्रिषूल, मुंड लिये व्याघ्र चर्म से जिनका अंग सुशोभित है, उन त्रिनयन, पंचमुखी, कमल पुष्पों की शय्या पर विराजमान भगवान शिव का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ हृीं हूं नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*बारहमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय रक्तपुष्प पर विराजमान, त्रिदेवस्वरूप (ऋग्-यजु-साम) त्रिनयन, कमल, केयूर, कंकण, कुण्डल से सुषोभित, तीनों लोकों (भूः भुवः स्वः) के रचयिता, पालनकर्ता एवं संहारक भगवान सूर्य देव का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ क्रौं क्षौं रें नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*तेरहमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय हजार नेत्रों वाले, पीतवर्णी, वज्र एवं कमलधारी आभूषणों से शोभायमान देवताओं के राजा इन्द्र का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ हृीं नमो नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

*चौदहमुखी रूद्राक्ष* धारण करने के समय उदित होते सूर्य की किरणों के सदृष कांतियुक्त, मूंज का जनेऊ पहने, वीरासन मुद्रा में बैठे हुए, स्वर्ण कुंडल-कांति से सुषोभित, नाद से प्रफृल्लित होने वाले पवनपुत्र हनुमान का ध्यान करते हुए ‘‘ॐ नमः’’ मंत्र का जाप करते हुए रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।
रूद्राक्ष धारण करने से भगवान शिव सहित सभी देवता प्रसन्न होते हैं, सुख शान्ति और प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है।

महाशिवपुराण की विद्येश्वर संहिता में कहा गया है कि रूद्राक्ष को अभिमंत्रित किये बिना धारण करने से धारक को नरक की यातना भोगनी पड़ती है। पद्मपुराण में भी रूद्राक्ष को अभिमंत्रित करके ही धारण करने की बात कही गयी है।
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