जदयू में जारी सियासी घमासान से पहले ही ले चुके हैं राष्ट्रीय अध्यक्ष पर फैसला!

जदयू के अंदर जारी है सियासी घमासान,राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव नहीं है आसान;आखिर में जारी होगा नीतीश का फरमान !

जनपथ न्यूज डेस्क
आलेखखाकार: गौतम सुमन गर्जना
27 नवंबर 2022

भागलपुर : बिहार में सियासी पार्टियों के भीतर खींचतान की खबरें लगातर आती रही हैं। ये खबरें किसी एक पार्टी के भीतर से नहीं आती, प्रदेश स्तर पर राजनीतिक पार्टियों में अंदरूनी घमासान आम बात हो गई है। हां, ये बात जरूर है कि क्षेत्रीय पार्टियों की खींचतान जल्दी बाहर आ जाती है। राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों में एक केंद्रीय कमांड काम करता है, जिससे कोई भी चीजें जल्दी बाहर नहीं आ पातीं। ताजा मामला बिहार की सत्ताधारी पार्टी जदयू को लेकर है। इन दिनों पार्टी सांगठनिक चुनाव के दौर से गुजर रही है। चुनाव के दौरान असंतुष्ट कार्यकर्ताओं की फौज जिला स्तर से लेकर प्रखंड स्तर पर सक्रिय है। हर जिले से विवाद की खबरें आ रही हैं। फिलहाल, पार्टी का कमान प्रदेश स्तर पर उमेश कुशवाहा संभाल रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर ललन सिंह संभाल रहे हैं। सियासी जानकारों की माने तो आरसीपी सिंह की विदाई होने के बाद से जदयू के अंदर बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं का गुट असंतुष्ट है।

नीतीश कुमार सब जानते हैं : सियासी जानकार मानते हैं कि आरसीपी सिंह जदयू में संगठन की राजनीति करते रहे हैं। कार्यकर्ताओं के प्रति इतने विनम्र रहे कि सबकी बात ध्यान से सुनते थे। उनके कार्यकाल में जदयू सांगठनिक स्तर पर काफी मजबूत हुआ। उनके कार्यकाल वाले कार्यकर्ता अभी भी उनके संपर्क में हैं और आरसीपी सिंह के लिए वफादार हैं लेकिन, अब जदयू के अंदर की स्थिति बदल गई है। राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह फाइव स्टार वाले पार्टी अध्यक्ष हैं। अपने शाही एटीट्यूड के लिए जाने जाते हैं। उन तक आम कार्यकर्ताओं का पहुंचना बहुत मुश्किल है। इधर,पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को लेकर विवाद की खबरें सतह पर आने लगी हैं। पार्टी सूत्रों की मानें, तो अध्यक्ष पद के दावेदार में उपेंद्र कुशवाहा भी शामिल है। लेकिन, कोई भी बिना नीतीश कुमार की हरि झंडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनेगा। वो भी तब, जब नीतीश कुमार खुद राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट करने में जुटे हुए हैं। उन्हें एक मजबूत और विश्वसनीय चेहरा अपने साथ चाहिए। उपेंद्र कुशवाहा पर दांव लगाने की जगह नीतीश कुमार खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बनना पसंद करेंगे।

जदयू अध्यक्ष तय : जदयू के पूर्व वरिष्ठ प्रवक्ता रहे और बिहार की सियासत को करीब से देखने वाले नवल शर्मा कहते हैं कि देखिए पहली बात तो नीतीश कुमार ‘घाघ’ राजनीति के गलियारों से निकले नेता हैं। उन्हें पता है कि पार्टी के अंदर क्या चल रहा है। नवल शर्मा कहते हैं कि वैसे भी जदयू के अंदर आज तक प्रजातांत्रिक नियमों का पालन नहीं किया गया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव नीतीश कुमार से इतर मामला नहीं है, जिस पर कोई मंथन हो। जो भी राष्ट्रीय अध्यक्ष होगा,उसमें नीतीश कुमार सिर्फ तीन चीजें देखेंगे। जातीय गुणा-गणित, ‘लव-कुश’ समीकरण और अति-पिछड़ा समीकरण। इन तीनों समीकरण को साधने वाला व्यक्ति ही राष्ट्रीय अध्यक्ष होगा। नीतीश कुमार की रणनीति पहले से तय होती है। नवल शर्मा जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को ‘जेबी’ (जेब में रहने वाली पार्टी) पार्टी का चुनाव मानते हैं। नवल शर्मा कहते हैं कि जदयू नीतीश कुमार की व्यक्तिगत दुकान है। उन्होंने कहा कि पहले आपने सुना होगा कि ललन सिंह खुद को केयर टेकर बताते रहे हैं। ये चुनाव नीतीश कुमार के व्यक्तिगत दुकान के केयर टेकर का चुनाव है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

जदयू राष्ट्रीय पार्टी नहीं : वहीं, मेरा मानना है कि जदयू में राष्ट्रीयत नाम की कोई चीज नहीं है। इस पार्टी में एक मात्र जिस नेता का वजूद है, वो हैं नीतीश कुमार। राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव को लेकर पार्टी के भीतर शीतयुद्ध की स्थिति बनी हुई है। ये बात नीतीश कुमार जानते हैं। मेरा मानना है कि यदि पार्टी ललन सिंह को रिप्लेस कर उपेंद्र कुशवाहा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाती है, तो सवाल उठता है कि ललन सिंह कहां जाएंगे? ललन सिंह उस स्थिति में खुद को डिमोट कर संसदीय दल का नेता नहीं बनना चाहेंगे। ललन सिंह लोकसभा में जदयू के नेता हैं.मैं पुरे विश्वास और दावे के साथ कहता हूं कि ललन सिंह ही दोबारा राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे और इसके दो कारण हैं। पहला तो ये कि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के विस्तार वाले फ्रंट पर ललन सिंह आगे हैं। उपेंद्र कुशवाहा कहीं नहीं हैं.इधर, नीतीश कुमार राष्ट्रीय राजनीति में जाना चाहते हैं। वैसे में ललन सिंह उनके सबसे विश्वसनीय सहयोगी होंगे। मेरा मानना है कि ललन सिंह जितने नीतीश के विश्वसनीय हैं, उतने उपेंद्र कुशवाहा नहीं हो सकते। ये बात नीतीश कुमार को भी बखूबी पता है। इन तमाम विकल्पों पर विचार करने के बाद साफ लगता है कि ललन सिंह राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर बने रहेंगे।

पार्टी के अंदर सियासी शीतयुद्ध : पार्टी में चल रहे अंदरुनी खींचतान पर सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार संगठन की एक-एक बात पर नजर रखे हुए हैं। नीतीश कुमार ने वक्त रहते अपना फैसला ले लिया है। उन्हें किसे राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद देना है। जदयू से जुड़े सूत्र कहते हैं कि फिलहाल जिस तरह ललन सिंह एक्टिव हैं, महागठबंधन से पार्टी का जिस तरह समन्वय बनाकर चल रहे हैं। इसे देखकर स्पष्ट होता है कि नीतीश कुमार ललन सिंह को ही रिपीट करेंगे। ललन सिंह ने पार्टी को नार्थ इंडिया में विस्तारित किया है और‌ ललन सिंह की राष्ट्रीय स्तर पर पकड़ मजबूत है। वहीं, सियासी जानकार कहते हैं कि नीतीश कुमार राष्ट्रीय अध्यक्ष के मुद्दे पर दो विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। पहला यह है कि खुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर रखना और दूसरा ललन सिंह को दोबारा अध्यक्ष पद सौंपना। तीसरा विकल्प उनके पास नहीं है। नीतीश कुमार बिहार में जिस तरह तेजस्वी को प्रोजेक्ट कर रहे हैं, उससे साफ लगता है कि वे अपना पूरा ध्यान राष्ट्रीय राजनीति पर देंगे।

ललन सिंह बनेंगे दोबारा अध्यक्ष : खुद मैं इस बात पूरी तरह कायम हूं कि दोबारा जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ही बनेंगे। अब आप इसका प्रमाण ले लीजिए। अगस्त 2019 में ललन सिंह के दिये गए बयानों को ध्यान से देखिए। जिस तरह नीतीश कुमार के पीएम पद के उम्मीदवार वाली कयासबाजी पर ललन सिंह ने प्रतिक्रिया दी है। क्या जदयू के किसी और नेता ने दी। ललन सिंह ने कहा था कि अगर अन्य दल चाहें तो नीतीश कुमार एक विकल्प हो सकते हैं। नीतीश कुमार का मुख्य ध्यान 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी से मुकाबले के लिए विपक्षी दलों को एकजुट करने पर है। ललन सिंह ने अगस्त में किस अधिकार से ये कहा कि सभी दलों को एक होकर लड़ना चाहिए और बाद में तय करना चाहिए कि नेता कौन होगा? इन बयानों का मतलब क्या है? नीतीश कुमार पहले से मन बना चुके हैं कि राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ललन सिंह को रिपीट किया जाए, ताकि वो कंफिडेंस के साथ राष्ट्रीय राजनीति को संभाल सकें।

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