गौतम सुमन गर्जना/भागलपुर

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7 अक्टूबर 2022

आजादी के 75 वें साल में भी देश प्रमुख तौर पर भ्रष्टाचार,गरीबी और बेरोजगारी से छटपटाते चुए दिथ रहा है। हम देवी- देवताओं को पारंपरिक रूप से पूजते आ रहे हैं, इस आशय से कि हमारी गरीबी दूर होगी, बेटे- बेटियों की नौकरी लगेगी, भ्रष्टाचार कम होगी लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है।
मौजूदा सिस्टम भ्रष्टाचारी को और भ्रष्टाचारी बना रहा है। यह गरीब को और गरीब बना रहा है। युवाओं को और बेरोजगार बना रहा है। हम आज भी इस वैज्ञानिक युग में भगवान भरोसे हैं कि वह सब कुछ ठीक-ठाक कर दैंगे। हम इंतजार कर रहे हैं कि अच्छा वक्त आएगा,अच्छे दिन आएंगे। इसी सोच और उम्मीद में हम बस इंतजार और इंतजार कर रहे हैं…!

अब वक्त आ गया है जब हम सभी को जिंदा रहने का सबूत देने होंगे.इस सिस्टम की होली जलानी चाहिए और इस दशहरे पर इस रावण रूपी सिस्टम का भी हमें एकजूट होकर पूरी सजगता के साथ दहन करने चाहिए. वर्ना पुरानी पीढ़ी तो बर्बाद हो ही चुकी है,अब नई पीढ़ी भी अशिक्षा, खराब स्वास्थ्य, गरीबी और बेरोजगारी में बर्बाद हो जाएगी, यह तय है।
अब तो भाजपा की अनुषांगिक इकाई आरएसएस ने भी स्वीकार कर लिया है कि देश में भयानक गरीबी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रय होसबोले ने भारत की आर्थिक स्थिति के बारे में कहा है कि देश में गरीबी और अमीरी के बीच खाई बढ़ती जा रही है। हमारी खबरपालिका यह तो प्रचारित करती रहती है कि देश के फलां सेठ दुनिया के अमीरों के कितने ऊँचे पायदान पर पहुँच गए हैं लेकिन वह यह नहीं बताती कि देश में अभी भी करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें भरपेट रोटी भी नहीं मिल पाती है। वे बिना इलाज के ही दम तोड़ते दिख रहे हैं। लगभग डेढ़ सौ करोड़ के इस देश में कहा जाता है कि सिर्फ 20 करोड़ लोग ही गरीबी रेखा के नीचे हैं, सच्चाई क्या है… मुश्किल से 40 करोड़ लोग ही गरीबी के रेखा के ऊपर है।
लगभग 100 करोड़ लोगों को क्या भोजन,वस्त्र,आवास, शिक्षा, चिकित्सा और मनोरंजन की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं? क्या वे हमारे विधायकों, सांसदों, सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों की तरह जीवन जीते हैं? जो हमारे प्रतिनिधि कहलाते हैं, जब वे किस बात में हमारे समान हैं? वे हमारी तरह तो बिल्कुल नहीं रहते।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में सिर्फ 4 करोड़ लोग बेरोजगार हैं। क्या यही असलियत है? रोजगार तो आजकल बड़े-बड़े उद्योगपतियों की कंपनियां दे रही हैं, क्योंकि वे जमकर मुनाफा सूत रही है लेकिन छोटे उद्योगों और खेती की दशा क्या है?

सरकार सर्वत्र डंका पीटती रहती है कि उसे इस साल जीएसटी और अन्य टैक्सों में इतने लाख करोड़ रु. की कमाई ज्यादा हो गई है लेकिन उससे आप पूछें कि टैक्स देने लायक लोग यानि मोटी कमाई वाले लोगों की संख्या देश में कितनी है? मेरे ख्याल से यह बड़ी मुश्किल से 10 प्रतिशत भी नहीं है और शेष जनता तो अपना गुजारा किसी तरह करती रहती है।

सरकारी अफसरों, मंत्रियों और नेताओं की एक तरफ ठाठ-बाट देखिए और दूसरी तरफ मंहगाई से अधमरी हुई जनता की बदहाली देखिए तो आपको पता चलेगा कि देश का असली हाल क्या है? जनता के गुस्से और बेचैनी को काबू करने के लिए सभी सरकारें जो चूसनियां लटकाती रहती हैं, उनका स्वाद तो मीठा होता है लेकिन उनसे पेट कैसे भरेगा? इसके त‌साथ ही आज मीडिया अमीरों और शासकों के गुणगान में चारण- भाट बन गई है। सरकार अपनी पीठ अपने से थपथपा रही है.वहीं देश के लोग महंगाई और बेरोजगारी की मार से कराह रहे हैं। उनमें आंदोलन या मूंह खोलने की शक्ति नहीं आ पा रही है। वह भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और गांधी की तलाश में बरसों बिता रही है। जनता सोचती है कि चंदशेखर आजाद, भगत सिंह दूसरे के घर में पैदा हों और वे शहीद हों, कुर्बानियां दे और हमारे घर का बेटा या परिवार सुरक्षित रहे। यह दोगलापन ही भारत को नंबर वन बनाने की दिशा में बाधक तत्व है। जरूरी है कि अब हर घर से लोगों को सड़क पर निकलना होगा और इन भ्रष्टाचारियों व बेइमानों से जंग लड़ना होगा, इसके साथ ही इस यथावाद सिस्टम पर प्रहार कर उसे उखाड़ फेंकना होगा।

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