*जानकर भाजपा में मचेगी खलबली*

जनपथ न्यूज डेस्क
Reported by: गौतम सुमन गर्जना/भागलपुर
Edited by: राकेश कुमार
8 सितंबर 2023

अचानक से गठबंधन की राजनीति में भाजपा का साथ छोड़ कर राजद के साथ जाने के बाद सीएम नीतीश कुमार अपने सबसे बुरे दिन में सफर कर रहे हैं। न जाने कितनी राजनीतिक लड़ाई से पार पा चुके नीतीश कुमार का आज खुद का राजनीतिक अस्तित्व एक बार फिर प्रतिस्पर्धा की धार पर चढ़ गया है। राजनीतिक संघर्ष के इस रास्ते भाजपा को शून्य पर आउट करने को संकल्पित नीतीश कुमार पर गत लोकसभा चुनाव में जीती 16 लोकसभा सीट निकालने की ही बड़ी जिम्मेवारी आ गई है। दरअसल, बिहार की राजनीति में बीजेपी के फीड बैक का अपना एक अलग तरीका होता है। हर बार कोई न कोई नया तरीका इजाद करते हैं और चुनाव की जमीनी हकीकत से गुजरते हैं। भाजपा के साथ रहते नीतीश कुमार भी जमीनी राजनीत तक संघटन बल को उतारकर चुनाव पूर्व अपने जनप्रतिनिधि की पूरी जानकारी लेते हैं। इस बार भी नीतीश कुमार ने लोकसभा चुनाव के पूर्व अपने सरकारी आवास पर पंचायत स्तर तक के नेताओं को बुलाया है। राजनीतिक गलियारों में नीतीश कुमार के द्वारा बुलाई गई 11 और 12 सितंबर की इस बैठक को भारी परिवर्तन भरा बैठक करार दिया गया है।

*अमित शाह के लगातार आगमन का दबाव झेल रहे नीतीश*

15 सितंबर को भाजपा के रणनीतिकार एक बार फिर बिहार आ रहे हैं। यह उनकी पांचवी यात्रा है। इस बार अमित शाह के निशाने पर दरभंगा और आसपास के लोकसभा सीट है। गौरतलब है कि अमित शाह के निशाने पर नीतीश कुमार और प्राथमिकता में बिहार की लोकसभा की 40 सीटें उसी समय बन चुकी थी, जब विपक्षी एकता की धुरी बिहार और उसके केंद्र में नीतीश कुमार आ गए थे। इसके पहले पूर्णिया, नवादा, वाल्मीकि नगर, मुंगेर की भूमि पर पहले ही दहाड़ चुके हैं। सासाराम का भी प्रोग्राम बना था पर तनाव के कारण स्थगित कर दिया गया था। बहरहाल, अमित शाह और बिहार पर उनकी चुनावी प्राथमिकता को इसी से समझ सकते हैं कि लोकसभा का विशेष सत्र शुरू होना है और 15 को अमित शाह बिहार की जनता को संबोधित करने आ रहे हैं।

*लव-कुश समीकरण और भाजपा की हकमारी*

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी है लव-कुश समीकरण के साथ अतिपिछड़ा वोटों का महागठबंधन में जाने से बिखराव। इसके कारण उप चुनाव में दो विधानसभा क्षेत्र में हार का सामना करना पड़ा था। दूसरा संकट है दल से लव-कुश समीकरण के दो चर्चित नेताओं का जदयू को अलविदा कर जाना। पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा और पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह का भाजपा के साथ खड़े हो जाना भी नीतीश कुमार के सामने संकट खड़ा कर दिया है। उस पर भाजपा ने सम्राट चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बना कर कुशवाहा में जबरदस्त सेंधमारी का रास्ता निकाल भी लिया है। नीतीश कुमार के सामने इन सब के विरुद्ध अपना वजूद बचाने की चुनौती भी है।

*क्या है 11 और 12 सितंबर की रणनीति?*

मिली जानकारी के अनुसार जदयू लोकसभा चुनाव को लेकर बड़ी समीक्षा बैठक करने जा रही है। सबसे पहल सीएम नीतीश कुमार की अध्यक्षता में जिला अध्यक्ष और प्रमंडल प्रभारी की बैठक होगी। यह बैठक 11 सितंबर को होगी, जिसमे नीतीश कुमार उनसे फीड बैक लेंगे। इस फीड बैक में जनप्रतिनिधि के कार्यों के बारे में, जनोपयोगी योजना के बारे में जानने की कोशिश करेंगे। वहीं 12 सितंबर को प्रखंड अध्यक्ष और विधानसभा प्रभारी, पार्टी के नेता और पार्टी के पदाधिकारी के साथ बैठक कर भी सही जानकारी हासिल करेंगे। यह बैठक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी आवास पर होगी।

*नीतीश कुमार क्या करना चाह रहे हैं?*

भाजपा को उसके ही लहजे में जवाब देंगे। यानी भाजपा के माइक्रो मैनेजमेंट की राह पर चल कर सरकार और संगठन दोनों की जानकारी लेंगे।
आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख कर विधायकों, पूर्व विधायकों और कुछ स्थानीय चुनिंदा नेताओं के आचरण, कार्य कुशलता, क्षेत्र में उपलब्धता, जनता की प्रति लगाव आदि जैसी जानकारियां लेंगे। नए गठबंधन को लेकर हानि और लाभ के बारे में जानकारी लेंगे। वोट बैंक में इस नए गठबंधन में जाने से क्या अंतर आया है? क्या नए गठबंधन में जाने से जदयू के पारंपरिक वोट पर कितना सकारात्मक और कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ा है?
भाजपा के बढ़ते हिंदुत्व के दावे से वोटर कितना प्रभावित हुआ है।भाजपा के सहयोगी दलों खास कर लोजपा रामविलास का कितना प्रभाव बढ़ा है,
उप चुनाव में बिखरते लव कुश समीकरण के कारणों की पड़ताल भी करेंगे।

*इस पड़ताल से हासिल क्या होगा ?*

दरअसल, नीतीश कुमार जदयू की जमीनी सच्चाई जानना चाहते हैं। महागठबंधन में शामिल होने के बाद समर्थन में किस-किस जाति का वोट बैंक बढ़ेगा या किस जाति का घटेगा? योजनाओं के प्रभाव में जदयू को जनता के बीच कितनी स्वीकार्यता है। साथ ही उनके जनप्रतिनिधियों के बारे में क्षेत्र की जनता क्या सोचती है। सबसे जरूरी तो यह जानकारी हासिल होगी कि गठबंधन की इस सूरत में उनके कितने सांसद और विधायक फिट बैठेंगे। यह उन्हें उम्मीदवार देने या बदलने में सहायक होगा।
एक राजनीतिक विश्लेषक के रुप में मेरा मानना है कि नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह ठीक उसी तरह की लड़ाई है जो राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव ने अपने पिता के बिना खुद को विधानसभा चुनाव 2020 में उपयुक्त साबित करते लालू यादव की असली विरासत बनने के दावे को साबित किया। विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन कर दिखा दी। अब नीतीश कुमार को फिलहाल गत लोकसभा चुनाव में जीती हुई सीट को फिर से जीतने की चुनौती से गुजरना होगा। क्या पता इस नए समीकरण में उनके साथ रहे न रहें। या फिर किस सांसद का परफॉर्मेंस ठीक नही हैं। किस लोकसभा का जिताऊ जातीय समीकरण के बरक्स किसे खड़ा किया जाए। इस तरह की कई चुनौतियां है। और सबसे बड़ी चुनौती तो अमित शाह बन गए हैं। अमित शाह ने परोक्ष रूप से नीतीश कुमार को उनके घर में ही परास्त करने की चुनौती दे डाली है। उसके विरुद्ध भी नीतीश कुमार को रणनीति बनानी है।
विपक्षी एकता मुहिम की शुरुआत करने के पीछे नीतीश कुमार का एक बड़ा मकसद रहा होगा। और उस खास मकसद के लिए सांसदों का संख्याबल जरूरी भी है। वैसे में नीतीश कुमार ने 40 लोकसभा सीटों में से 40 सीटें निकालने का जो संकल्प लिया है उसके लिए जमीनी सच्चाई से जानना भी जरूरी है। ऐसा इसलिए भी कि नींव तो धरातल पर ही तैयार करनी होगी। और इसके लिए 11 सितंबर और 12 सितंबर की बैठक काफी महत्वपूर्ण और जरुरी भी है।

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