जनपथ न्यूज डेस्क

Reported by: गौतम सुमन गर्जना, भागलपुर
Edited by: राकेश कुमार
28 सितंबर 2022

भागलपुर: दुर्गा पूजा 2022 का शुभारंभ हो गया है। दो साल कोरोना के ग्रहण के बाद इस बार त्योहार की रौनक देखने को मिल रही है। बिहार के सभी जिलों में मां भगवती की अराधना हो रही है। भागलपुर में भी लोग माता की अराधना में लीन हो गये हैं। जगह-जगह पर पूजा पंडाल बनने लगे हैं। भागलपुर के प्रसिद्ध मंदिरों में एक है नवगछिया अनुमंडल के नारायणपुर प्रखंड अंतर्गत भ्रमरपुर दुर्गा मंदिर, जहां दूर-दराज से श्रद्धालु पहुंचते हैं और अपनी मनोकामना पूरी करने की लालसा लेकर माता का पूजन करते हैं।

*करीब 350 वर्ष पुराना है मंदिर का इतिहास*
भ्रमरपुर दुर्गा मंदिर का इतिहास करीब 350 वर्ष पुराना बताया जाता है। इस मंदिर को सिद्धपीठ मणिद्वीप के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर पूजा कमेटी के अध्यक्ष डॉ. हिमांशु मोहन मिश्र दीपक बताते हैं कि इस मंदिर की महत्ता कुछ विशेष है। बताते हैं कि जिस तरह भगवान श्रीराम का निवास स्थान साकेत है। श्रीकृष्ण गोलोक में और भगवान शंकर कैलाश में विराजमान हैं ठीक उसी तरह मैय्या का निवास स्थन मणिद्वीप ही है और भ्रमरपुर मंदिर में मां अपने सहगामिनियों के साथ निरंतर निवास करती हैं, इसलिए इसे मणिद्वीप का दर्जा दिया जाता है।

*गंगा की मिट्टी से हजारों ब्राह्मणों ने मिलकर बनाया पिंड*
इस मंदिर का इतिहास करीब 350 वर्ष पुराना है। बताया जाता है कि बिरबन्ना ड्योढ़ी के क्षत्रिय परिवार और भगीरथ दत्ता झा के परिवार ने इस मंदिर की स्थापना की थी। जिस स्थान पर अभी मंदिर है, वहां ठीक पास में कभी गंगा की धारा बहा करती थी। एक बार करीब हजार की संख्या में ब्राहमणों ने गंगा स्नान किया और गंगा की मिट्टी हाथ में लेकर वर्तमान दुर्गा मंदिर की जगह पर लाकर रख दिया। धारा प्रवाह मंत्र उच्चारण के जरिये मां की प्राण प्रतिष्ठा हुई और पिंड अस्तित्व में आ गया।

*मंदिर में दुर्गा सप्तशती का पाठ*
आज मंदिर प्रांगण में नवरात्रि के मौके पर अधिक भक्तिमय माहौल रहता है। प्रांगण में दुर्गा मंदिर में सभी ब्राह्मण बैठकर दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। महाशय ड्योढ़ी चंपानगर से प्रतिमा बनाने वाले कारीगर चार पीढ़ियों से प्रतिमा बना रहे हैं। पंडित शशिकांत झा मां दुर्गा की यहां पूजा करते हैं, जबकि प्रधान पुजारी अभिमन्द स्वामी पूजन पर बैठते हैं। भ्रमरपुर दुर्गा मंदिर में तांत्रिक पद्धति से पूजा होती है। निशा पूजा के दिन देवी की प्राण प्रतिष्ठा होती है। नवमी के दिन 1200 बलि दी जाती है। लोग दूर-दराज से आते हैं और अपनी मन्नत मां से मांगते हैं।

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