*आरक्षित सीट को जनरल सीट घोषित करे राज्य सरकार या सुप्रीम कोर्ट ले कोई फैसला*

Reported by: गौतम सुमन गर्जना, भागलपुर
Edited by: राकेश कुमार
7 अक्टूबर 2022

भागलपुर : हाईकोर्ट पटना के आदेशोपरांत राज्य निर्वाचन आयोग ने मंगलवार की रात को बिहार में चल रहे नगर निकाय चुनाव को फिलहाल स्थगित कर दिया है। अब राज्य सरकार इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। हालांकि, इसके बावजूद भी चुनाव के लंबे समय तक लटकने की संभावना दिख रही है।

नगर निकाय चुनाव में उम्मीदवार के तौर पर खड़े प्रत्याशियों के मन में कई तरह के भ्रम की स्थिति बनी हुई है। पूरे बिहार में निकाय चुनाव को लेकर जो प्रचार-प्रसार का शोर चल रहा था, वह पूरी तरह से थम चुका है। ऐसे में अभी तक उन प्रत्याशियों को यह पता नहीं है कि आगे क्या होने वाला है? जनपथ न्यूज डाॅट काॅम के भागलपुर प्रमंडलीय चीफ ब्यूरो गौतम सुमन गर्जना ने इस मसले पर कानून विद से बातचीत की पढ़िए बिहार में कैसे हो सकता है निकाय चुनाव…

बुधवार को बिहार सरकार के वरिष्ठ मंत्री विजय चौधरी ने साफ तौर पर कहा कि नीतीश सरकार अति पिछड़ों के अधिकार को लेकर सजग है। हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार को उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला सरकार के पक्ष में होगा। हालांकि बिहार सरकार अगर सुप्रीम कोर्ट जाती है तो मामले की सुनवाई तत्काल में होने के आसार नहीं के बराबर हैं। सुप्रीम कोर्ट से यदि राज्य सरकार प्रार्थना करती है तो इस मामले की सुनवाई जल्द की जा सकती है क्योंकि निकाय चुनाव को लेकर चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसमें कैंडिडेट से लेकर सरकार का भी खर्च ज्यादा हो चुका है।

निकाय चुनाव में पिछड़ों के आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट आदेश दिया हुआ है कि उसमें किसी राज्य को कोई छूट नहीं दी गई है। बिहार के मामले में भी पटना हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश आदेश के आलोक में सुनवाई की है। पटना हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देकर अपना जजमेंट दिया है। बिहार सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले को ही बदलने के पक्ष में नहीं रहेगा। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार यदि सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देती है तो यह मामला आगे फंस सकता है क्योंकि हाईकोर्ट ने कहा है कि ट्रिपल टेस्ट राज्य सरकार को कराना होगा और यह ट्रिपल टेस्ट पटना हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत दिया है।
इस बावत वरिष्ठ अधिवक्ता एसबीके मंगलम कहते हैं कि राज्य सरकार ने ट्रिपल टेस्ट के आदेश को नहीं माना है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही इस तरह के आदेश दिए हुए हैं। मंगलम कहते हैं कि मात्र एक जगह पर राज्य सरकार ने नियम का पालन किया है कि 50% से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया है, लेकिन न यहां आयोग बना, न कोई आंकड़े आए, न कोई पॉलिटिकल बैकवार्डनेस को लेकर कोई रिपोर्ट आई है जिसे हाईकोर्ट के समक्ष पेश नहीं किया गया। राज्य सरकार ने के० कृष्णामूर्ति के खंडपीठ के आदेशों का कोई पालन नहीं किया है। अब यह समझने वाली बात है कि जब इश्यू वही है और कोई कागज और सबूत नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट में बहुत सफलता नहीं मिल सकती है। मंगलम के मुताबिक भले सरकार सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रही है लेकिन जब आदेश सुप्रीम कोर्ट का ही है तो अपने आदेश के खिलाफ फैसला कैसे दे सकती है इसलिए सुप्रीम कोर्ट से बहुत उम्मीद नहीं करनी होगी।

वरिष्ठ अधिवक्ता एसबीके मंगलम ने बिंदुवार तरीके से बताया कि ये चुनाव कैसे और कितने समय में हो सकता है…
• दूसरे राज्यों में भी इस तरह के मामले आए थे,तो सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया था कि जो भी आप लोगों ने चुनाव कराए हैं उसे जनरल सीट से घोषित करके, चुनाव करें.चुनाव नहीं रोक सकते हैं। जिस सीट पर आरक्षण है, उसे सामान्य करके ही चुनाव कराया जा सकता है और यही हाईकोर्ट का आदेश है और सुप्रीम कोर्ट ने डिक्लेयर ड्रॉ दिया है।
• चुनाव आयोग को किसी से कोई अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। राज्य सरकार से अनुमति के आधार पर चुनाव नहीं कराई जाती है। चुनाव कराना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है, जो कराना होता है और कोर्ट का आदेश जो है उसका पालन करना पड़ेगा।
• क्लियर करना होगा कि किसी के लिए इस चुनाव में आरक्षण नहीं होगा। यह बिना आरक्षण का चुनाव है, सभी सीट सामान्य माने जाएंगे और फिर से नॉमिनेशन की कार्रवाई होगी।
• चुनाव आयोग को सिर्फ शेड्यूल नोटिफाई कर देना होगा। आरक्षण खत्म करके शेड्यूल नोटिफाइड करना है। चुनाव आयोग को एक नोटिस करना होगा, जिसमें सभी जो आरक्षित सीट हैं, उसको सामान्य घोषित करके चुनाव का नए तारीख घोषणा करनी है।

वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री सह भाजपा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि आयोग का काम आरक्षण तय करने के लिए आंकड़ा इकट्ठा कर चुनाव करना है। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लेकर जानकारी दी गई थी। राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निकाय चुनाव में अति पिछड़ों को आरक्षण देने को लेकर दिए गए निर्देश की अवहेलना की गई.हाईकोर्ट ने इस तरह की अनदेखी के खिलाफ राज्य सरकार के फैसले को रोक लगाई है।

उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार से मेरे कुछ सवाल हैं- सुप्रीम कोर्ट ने नगर निकाय चुनाव को लेकर अति पिछड़ा समाज को आरक्षण देने को लेकर दिए गए निर्णय पर अनदेखी क्यों किया? नीतीश कुमार ने अति पिछड़ा समाज के लिए फैसला इसलिए नहीं किया क्योंकि ईबीसी और ओबीसी के वोट बैंक ना खत्म हो जाता? सिर्फ वोट बैंक बचाने के लिए राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस विषय पर 6 फैसलों को अनदेखी किया। नीतीश कुमार से रविशंकर प्रसाद का दूसरा सवाल: राज्य चुनाव आयोग पर कौन गलत दबाव बना रहा है? उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की सरकार गैर कानूनी रूप से काम करती है। इस तरह के 6-6 सुप्रीम कोर्ट के फैसले हैं।

वहीं, जदयू संसदीय बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि बिहार में निकाय चुनाव अति पिछड़ों के आरक्षण बिना नहीं होगा। उन्होंने कहा कि भाजपा जनता को उलझाने की कोशिश कर रही है। उनका मुख्य मकसद केंद्र से आरक्षण खत्म करना है। वे ओबीसी का 27% आरक्षण भी समाप्त करना चाहते हैं। जबतक फिर आरक्षण नहीं होगा चुनाव नहीं होगा.जो स्थिति बिहार में बनी उसके लिए उन्होंने भाजपा को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि नीतीश कुमार का स्टैंड साफ है, वे अति पिछड़ा वर्ग के लिए लड़ेंगे। लोग भी इस बात से आश्वस्त हैं। श्री कुशवाहा ने कहा कि नीतीश कुमार के रहते उनके हक को कोई छीन नहीं सकता है। हर जिला मुख्यालय में जदयू भाजपा के खिलाफ पोल खोलेगी। उन्होंने आरक्षण विरोधी पोल खोल कार्यक्रम को एक हफ्ते में शुरू किये जाने की बात कही।

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