भोजपुरी पाठकों के लिए विशेष. 'काका के ठीहा' : काथा गइल वन में, सोच अपना मन में

भोजपुरी पाठकों के लिए विशेष. ‘काका के ठीहा’ : काथा गइल वन में, सोच अपना मन में

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भूलन काका आज बहुत खुश बाड़े. अइसन बात नइखे कि उ आउर समय दुखी रहेले. उ त खुशमिजाज आदमी हइये हउअन. बाकिर आज उनका खुशी के धरान नइखे. अइसन अक्सर देखे में आवेला कि भूलन काका जब जादा खुश होले त मोहल्ला के लइकन के बोला के टॉफी बांटेले.

भोजपुरी के विस्तार, पाठकों को ध्यान में रखते हुए ‘जी डिजिटल’ आपकी प्रिय भाषा में आपके पास पहुंचने की कोशिश कर रहा है. आपके लिए हम ‘काका के ठीहा’ नाम से कॉलम शुरू कर रहे हैं, जिसमें भोजपुरी भाषी क्षेत्र की संस्कृति, समाज, राजनीति, साहित्य, फिल्म पर सामग्री, राय, विचार उपलब्ध कराने जा रहे हैं. आशा है, यह पहल पसंद आएगी. आइए, मिलकर भोजपुरी की मिठास साझा करें : संपादक

भूलन काका आज बहुत खुश बाड़े. अइसन बात नइखे कि उ आउर समय दुखी रहेले. उ त खुशमिजाज आदमी हइये हउअन. बाकिर आज उनका खुशी के धरान नइखे. अइसन अक्सर देखे में आवेला कि भूलन काका जब जादा खुश होले त मोहल्ला के लइकन के बोला के टॉफी बांटेले. लइका सब मुंह में टॉफी आ पाकिट में ओकर चमकी (रैपर) डाल के खूब जोर से ‘भूलन काका जिंदाबाद’ बोलत उनका दुआर के चक्कर लगाके गोल घेरा बना बइठ जाले स. एकर मतलब इ होला कि अब भूलन काका कहानी सुनइहन. ए लइका लोग हम कहानी त सुनाएब बाकिर हमार एगो शर्त बा. बीच में केहू कुछु ना बोली. भूलन काका के इ शर्त मंजूर बाटे के इशारा में सब लइकन के गरदन दहीना तरफ झूक गइल. काका शुरू हो गइले –

काली माई के बगईचा में आम के गाछ पर एगो सुग्गा-सुग्गी रहले स. रोज सबेरे दुनो फल के तलाश में उड़त-उड़त बड़ी दूर-दूर तक जाके फेर शाम के अपना खोंता (घोंसला) में लौट आव स. चिरई समाज में दूनो के प्यार आ भरोसा के बेमिसाल जोड़ी रहे. अचानक सुग्गा उदास रहे लागल. खाइल-पीयल, उड़ल, बोलल सब कम होखे लागल. सुग्गी सोचे लगली कि हमरा हंसत-बोलत सुग्गा के अचानक इ का हो गइल. सुग्गा अब अपना सुग्गी के साथे पेड़ पर ना जाके कहीं आउर जाये लागल. एक दिन सुग्गी सोचली कि देखीं त इ हमरा साथे ना जाके कहां जायेले. सुग्गा उड़-उड़ के कभी मंदिर तो कभी मस्जिद, कभी चर्च तो कभी गुरुद्वारा के मुंडेर पर बइठे. सुबह से शाम हो गइल. सुग्गी आपन सुग्गा के ई हालत देखके बड़ा निराश हो गइली. उनका इ ना बुझाव के सुग्गा कवना फेर में बाड़े. कवन बात के लेके परेशान बाड़े. कतना दिन हो गइल सुग्गा के साथे कवनो फल-फूल के बगइचा में गइल. आखिर सब कइसे ठीक होई. सुग्गी एही सोच में हमेशा रहे लगली.

अब आम के सीजन आ गइल रहे. अब सुग्गी के दूर ना जाये के पड़े. ओही आम के बगइचा में ऐतना तरह के आम रहे कि रोज अलग-अलग आम के स्वाद मिल जाव. सुग्गा के अब खाये-पीये में पहिले जेतना चाव ना रह गलइ रहे. अइसन लागे कि उ हमेशा कवनो दोसरा खेयाल में डूबल रहे. जब जादा भूख लागे त एक-आध आम पर चोंच मारके काम चला लेस बस. रोज अकेले बाहर जात-जात सुग्गी के मन भी उदास रहे लागल. सोचली कि आज त सुग्गा से उनका मन के बात जानिये के रहब. देखतानी काहें नइखन बतावत. इ सोचत सुग्गी ओह दिन शाम होखे के पहिलही जल्दी खोंता में आ गइली. खोंता में घुसे से पहिले उनका बुझाइल खोंता के कवनो हलचल होत बा. उ सोचे लगली कि आखिर हमरा खोंता में सुग्गा के साथे हमरा अलावे आउर के बा. उ धीरे से खोंता में झांक के देखे लगली. सुग्गा कवनो छोट सुग्गा के खूब लाड़-प्यार करत रहले. अरे इ त एकदम आज काल के जन्मल सुग्गा लागता. जल्दी से उ खोंता में गइली. सुग्गा उनका के देखते खुशी से ओह नवजात सुग्गा के देत कहले – ‘इ ल आपन अमानत.’ सुग्गी चिहुकत उनका से पूछली ‘आरे इ कहां मिलल.’

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सुग्गा के आंख में आंसु आ गइल ‘बूढ़ा बाबा के मजार के पास जामुन के पेड़ पर एगो सुग्गा के जोड़ा रहे. इ ओकेरे बच्चा ह. ओह दुनो प्राणी के शिकारी पकड़ के ले गइलन स. हम ढेर दिन से देखत रहनी ह कि शिकारी ओकरा फेर में पड़ल बाड़न स. ओकनी के बचावे खातिर कई गो उपाय कइनी, खूब हल्ला भी मचवनी बाकिर कवनो फायदा ना भइल. एह छोट बच्चा के माई-बाप के हम ना बचावे सकनी. एह बात के दुख बा. एकरा के देखनी त हमरा दया आ गइल. एही से अपना साथे ले अइनी. आखिर अब एकर ऐह दुनिया में आउर के बा.’ सुग्गा के बात सुन सुग्गी के आंख में भी आंसू आ गइल. अपना सुग्गा के दयालुता पर नाज करत उ खूब भाव-विभोर हो गइली. मने-मन सोचली कि अह अपना सुग्गा के बारे में कतना उल्टा-पुल्टा सोचली. हमार सुग्गा दोसरा सुग्गा के जान बचावे में अतना दिन से परेशान रहे. आ हम्म…!
काथा गइल वन में, सोच अपना मन में. इ कहके भूलन काका उठ के चल गइले. लइकन के टोली फेर एक बार ‘भूलन काका जिंदाबाद’ कहत अपना-अपना घरे चल दिहले स.

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